अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Saturday, August 6, 2011

लम्हें जो याद रहेंगे.



मुझे आज हर उस चीज़ को याद करके यहाँ पर लिख देने का मन कर रहा है जिसका कोई भी ज्ञात  या अज्ञात सम्बन्ध पहला शब्द से हो.
पर ऐसे एक तो मेरी याददास्त इतनी अच्छी नहीं कि हर उस आम-ओ-खास को यहाँ पर उतार पाऊं, दूसरा ये संभव  भी नहीं होगा की हर वो बात प्रासंगिक  ही हो जाय , 
जो मुझे याद आ पड़े और उसे मैं यहाँ पर लिख दूँ फिर भी कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं जो अच्छी लग रही हैं. 


प्यार का पहला ख़त  लिखने में वक़्त तो लगता है, नए परिंदों को उड़ने में
वक़्त तो लगता है...

मुझे भी इस ब्लॉग को लिखने में बहुत वक़्त लग रहा है.


 कहते हैं हर पहली चीज़ बहुत यादगार होती है मसलन पहला दिन कॉलेज का,पहली सैलरी,पहला प्यार,कुछ मामलों में पहला पति या पहली बीवी .
यहाँ पर मामला पहले दिन भारतीय जन संचार संस्थान की यादों को साझा करने का है.यादों का पिटारा एक ही दिन में भरा हुआ है बस सोच रहा हूँ क्या क्या लिखूं क्या क्या साझा करूँ.?
अब वो सब साझा कर देता हूँ जो जो अंगुलियाँ लिख पायें.



(पहुचने से पहले) भैया कौन कौन से नंबर की बस जाती है उस रूट में.?कितना टाइम लगेगा?नज़दीकी मेट्रो स्टेशन कौन सा होगा?
अब छोड़ो जाने कितना समय लग जायेगा, चलो ऑटो ही कर लो पहला ही  दिन तो है कल से  पूछ कर बस से जायेंगे.
(पहुचने के बाद) कैसा होगा पूरा कैम्पस?कौन कौन आएगा वहां?यहाँ की फैकल्टी   कैसे होगी?कौन कौन लोग होंगे फैकल्टी में?ऑडिटोरियम कहाँ है?
यही वो कुछ सवाल हैं जो आमतौर पर पहले दिन हम पूछते हैं.पर मुझे इन सवालों से ज्यादा वास्ता नहीं था क्योंकि मेरे लिए "जैसे उड़ जहाज़ को पंछी फिर जहाज़ पे आये" वाली स्तिथि थी.
कैम्पस पुराना था फैकल्टी जानी पहचानी थी पर आज मैं खुद को भी नया और सब कुछ नया पा रहा था.कुछ तो नया ज़रूर था शायद जोश नया जूनून नया और ख्वाब नया.

परिचय की रस्म शुरू हुई.मुझे इस बात की जल्दी थी कि मैं अपने बगल वाले मित्र को ये बताऊँ देखो ये सर इस विभाग के हैं ये मैडम उस विभाग की हैं
.ताकि उन्हें लगे कि मैं लोगों को जनता हूँ
 और मेरी बादशाहत को पहचान मिले..
(कभी ऐसा सोच कर खुद को कमअक्ली समझता हूँ पर ऐसा होना स्वाभाविक भी है)
सबसे पहले डॉक्टर आनंद प्रधान ने खुद का परिचय देते हुए सभी का स्वागत किया और परंपरागत रूप से संस्थान की तारीफ़ में कई बातें रखी जो आगे भी वक्ताओं ने   जारी रखी.
अगली बारी के. एम. श्रीवास्तव की थी जो प्रेरणादायक  इसीलिये थी कि वे खुद इसी संस्थान के १९७७ में छात्र रह चुके थे.
जय श्री जेठवानी ने सलाह देते हुए कहा कि मुझे यहाँ पर सख्त माना जाता है और मैं सख्त इसीलिये हूँ क्योंकि बाज़ार सख्त है.
उन्होंने ये भी जोड़ा "अपनी नही अपने सीनियर लोगों की गलतियों से सीखें".सन्देश समझा जा सकता है.
एस. राघवाचारी ने मीडिया के एस. आर. के. करण से एच. आर. के. करण और मर्डोकीकरण से सीखते हुए आगे बढने की बात कही.
प्रोफ़ेसर शिवाजी सरकार ने मीडिया मैं नैतिकता के पतन की ओर इशारा किया और जोर देकर माना कि सरकारी संस्थान आज भी पत्रकारिता की ताक़त बने हुए हैं.
गीता बमजई के परिचय ने मीडिया शिक्षण में में करियर बनाने की चाह रखने वालों के आँखों में जरुर चमक लाई होगी क्योंकि वे खुद १९७७ में श्रीवास्तव सर के साथ यहीं से पढी थी और आनंद सर एक वक़्त उनके शिष्य भी रह चुके हैं.
अगली बारी संस्थान के सबसे बुज़ुर्ग (ऐसा उनका परिचय देते हुए मजाक के तौर पर कहा गया था) मेरा मतलब है सबसे सीनियर (१९७७ से) फैकल्टी स्वपन ब्रहमचारी की जिन्होंने कम शब्दों में सिर्फ शुभकामनाएं दी.
यहाँ से दौर कम शब्दों में शुभकामनाओ का चल पड़ा जिसमे सुनेत्रा सेन नारायण ने "मीडिया को सक्रिय" और शालिनी नारायण ने"सरकारी मीडिया पर किसी भी तरह तरह के प्रश्नों के ज़वाब देने का आश्वासन" दिया.
अगली बारी मेरी व्यक्तिगत फेवरेट प्रोफ़ेसर शाश्वती गोस्वामी की थी जिन्होंने अपने चिरपरिचित प्यार भरे अंदाज़ में इस रिश्ते को संस्थान से बाहर तक ले जाने की अपील की.
ओ. एस. डी. जयदीप भटनागर और पोफेसर हेमंत जोशी ने आशीर्वाद देते हुए स्वागत किया.
अंत में आवाज़ के फनकार महानिदेशक सुनीत टंडन ने संस्थान की उपलब्धियों पर बात करते हुए स्वागत और शुभकामनाएं दी.


इन सबके बीच जो कुछ नया और
उत्सुकता जगाने वाला
था वो था वो विविधता और इन्द्रधनुषी छटा लिए
हुए वहां प्रवेश पाए युवाओं का जोशऔर विवेक .
हर किसी का प्रयास था ज्यादा से ज्यादा लोगो को जान
लेने का.ख़ास कर मुझे तो ऐसा लग रहा था
(अभी भी लग रहा है) कि बस अभी सबकुछ जान लूँ सबके
बारे में और सब कुछ सीख लूँ उनसे.
पर ऐसा इतनी जल्दी संभव तो नहीं.




खूब और खूबसूरत लोगों के बीच अगले ९-१० महीने खूबसूरत गुज़रने वाले हैं ऐसा भरोषा है.

और हाँ अविनाश कुमार चंचल के सौजन्य से पिलाई गयी दोस्तों के बीच की पहली कॉफी अविस्मरणीय......