अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Sunday, January 1, 2012

सवाल बदल रहे हैं.

पहली मुलाकात में नाम पूछने से परिचय की शुरुआत होती है.आगे-आगे बातें बढ़ती जाती हैं.फिर परिवार, समाज,आस पड़ोस बातचीत में आने लगता है.

इस नाम में बड़े बड़े राज़ छिपे होते हैं.किसी से परिचय करते हुए जब मैंने उसे अपना नाम नीरज भट्ट बताया तो वो झट से बोल पड़ा आप बॉलीवुड वाली पूजा भट्ट के भाई हैं क्या?

एक आम आदत के तौर पर मेरी भी आदत थी/है पूरा नाम पूछने की.किसी से मिलता था तो उसका पूरा नाम पूछ ही लेता था.अक्सर नाम से ये कोशिश होती थी कि बिना मेहनत के कुछ सीधे निष्कर्ष निकाल लिए जाएँ.

मसलन कहाँ का है?किस जाति का है?ऐसा उपनाम पहले से सुना कि नहीं.और कई बार ऐसी मजाक कि अरे आप मोदी जी हैं "नरेन्द्र मोदी टाइप हो या ललित मोदी टाइप?"




बनर्जी, मुखर्जी, टाइप हो तो अच्छा आप बंगाली बाबू हैं.झा, मिश्र हैं तो बिहार के हैं.गिल, कपूर, भल्ला, अरोड़ा हैं तो पंजाबी हैं.भट्ट, जोशी, आर्य, टम्टा बिष्ट, हैं तो उत्तराखंड के हैं.और 'याल' से लय मिलाता नाम (जैसे उनियाल, थपलियाल, पोखरियाल आदि) हो तो गढ़वाल से हैं.

अब मेरे ऊपर के लिखे उपनामों में भी ज़्यादा उपनाम ब्राह्मणों के हैं.यही मानसिकता सवालों को बदलती है.

अब सवाल बदलने लगे हैं.जब से दिमाग के दायरे खुल रहे हैं सवालों के दायरे बढ़ रहे है?जब इन सवालों पर भी सवाल उठने लगें तो फिर आप सवाल देखा देखी में खुद भी बदलने लगते हैं.



कहते हैं जे एन यू में जो भी जाता है राजनीतिक बन कर बाहर आता है.मैं जे एन यू तो नहीं जा पाया हाँ उसी परिसर के अन्दर घुस ही गया.
जब से घुसा हूँ लगता है राजनीति पास आ
रही है.अब परिचय के दौरान नाम के बाद पूरा नाम पूछने का मन नहीं होता.अब मन करता है कि पूछूँ आप किस विचारधारा के हैं?इस परिसर के अन्दर या आसपास होता हूँ तो सवाल का लगता है जवाब होगा "वामपंथी".

फिर भी मन में सवाल उमड़ते रहते हैं. हम लोग एक बाहर की फैकल्टी के बारे में बहुत दिनों तक भ्रम कि स्थिति में रहे.

बड़ी इच्छा यह जानने की होती है आप किस विचार से वास्ता रखते हैं?और क्यों?एक दिन जब उन्होंने अपनी राय मुखर होकर रखी तो बाहर एक हम सब दोस्तों के मुंह से निकला "ये भी वामपंथी निकला".
मेरे लिए तो यह अब एक उपजाति हो गयी है.


अन्ना के आन्दोलन ने भी एक जाति समूह बनाया.इस दौरान भी मेरा सीधा सवाल होता था कि आप कहाँ खड़े हैं?इससे फिर आगे के विश्लेषण किये जाते?
"भारत रत्न" देने को लेकर आप सचिन के साथ खड़े हैं या ध्यानचंद के साथ?


जे एन यू में ही एक दिन इमरजेंसी के दौरान स्टैंड लेने के जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार "कुलदीप नैयर" को सुना.उन्होंने पत्रकारिता के मुझ जैसे भ्रूणों से पूछा कि खुद से पूछो कि तुमने आज तक कितनी बार स्टैंड लिया?क्या तुम उस चीज़ के खिलाफ ख
ड़े हुए जो तुम्हें नैतिकता के खिलाफ लगी?

सौ टके का सवाल था.सवाल का ज़वाब ख़ुद में ढूंढ रहा हूँ.

आज जब पीछे मुड़कर अपने इस वैचारिक बदलाव को देखता हूँ तो आशान्वित होता हूँ.स्टैंड लेना सीख रहा हूँ.अभी तक किसी पंथ के साथ पंथी बनने लायक तो नहीं हुआ.और पंथी बनने का कोई इरादा भी नहीं है.पर बेलाग बन जाऊं इस प्रयास में हूँ.

साफ़ तौर पर इस तरह की जाति पूछने की आदत उस आदत से बेहतर लगती है.पर कई लोगों को आज भी अपनी वैचारिक जाति पर बात करने से संकोच होता है.संकोच नहीं होता तो अतिवाद होता है.

विचारधारा का तीखा होना दूसरे विचार के जन्म लेने के लिए खाद बनता है.जब एक तरह के विचार को थोपने की कोशिश की जाती है,या उसे सर्वोत्तम बताया जाता है और आप आलोचनात्मक होते हैं और आप भी विचार बनाने लगते हैं.ये मेरे साथ हुआ है.ऐसा लगता है विचार के बनने, उभरने के लिए विचारों का विनिमय ज़रूरी है.