चांदनी चौक की संकरी गलियों में अभी भी खाने-खिलाने वालों की भीड़ थी. गली के ठीक बाहर मस्ज़िद का गेट नंबर 2 है. इस गली के सामने कुछ रहनुमाओं का जमावड़ा लगा था. करीब 15 लोग मंच पर बैठे थे और 40 -50 के करीब उन्हें सुन रहे थे. यहाँ पर बेटियों को लेकर चिंता जताई जा रही थी. ये लोग माइक पर जोर जोर से अवाम से कह रहे थे कि "हमें महिलाओं को उनका सम्मान लौटना होगा. स्त्री के हको-हुकूक के लिए हमें आगे आना होगा."
ये बातें हमने गुजरते गुजरते सुन ली थी. जब बड़े लोग ऊँचे मंचों से बोलते हैं तो बातें अच्छी ही निकलती हैं.
बड़े लोगों की सभा के कारण चांदनी चौक के अन्दर रिक्शा भी नहीं जा रहा था. हम 4 दोस्त हंसी ठिठोली करते हुए ऑटो पकड़ने रोड़ की तरफ निकल पड़े.
आधी रात में भी दिल्ली की सड़कें सुनसान नहीं होती. ये सड़कें या तो लोगों की आवत जावत से गुलज़ार रहती हैं या हादसों के चलते खबरों में.
ये सड़कें महिलाओं के लिए असुरक्षित होने की बदनामी भी झेलती हैं. हादसे सड़क पर धमक कर चलने वाले करते हैं. अब भला इसमें सडकों का क्या कुसूर?
जामा मस्ज़िद के आगे से बाहर आते आते गली में अँधेरा बढ़ता जा रहा था. जहाँ पर गली ख़त्म हो रही थी वहां से एक अधेड़ उम्र की महिला अकेले अन्दर की तरफ जा रही थी.
वो पुलिस वाले को टक्कर मारते हुए निकली.
वो अकेली थी. मैंने पहली बार उसके पास से गुजरने वालों को डरते हुए देखा. वो महिला आसपास के मर्दों को छेड़ रही थी.
फरवरी की रात थी. ठंडी हवा चल रही थी. ठण्ड से बचने के लिए उसने शॉल ओढ़ रखा था. ऐसा लग रहा था कि इस शॉल ने मर्द की उस नज़र के लिए बेड़ लगा दी थी जो सीधी औरत की छाती पर टिकती है.
उसे इस बात का अहसास हो गया था. उसने धीरे से अपनी शॉल को करीने से समेट लिया. पहले उसका लम्बा खुला शॉल ऊपर के बदन को पूरा ढके हुए था. चलते चलते उसने शॉल की तह बना दी. अब उस शॉल के अगल बगल से इतनी जगह बन गयी थी कि मर्दों की नेकनियति ढीली पड़ जाये.
उसे छेड़ने वाला नहीं मिल रहा था. दिल्ली की उस अंधेरी गली के मर्द अचानक इतने भोले कैसे हो गए थे.
उस महिला की बॉडी लैंग्वेज़ से लग रहा था कि उसे शायद वह मिल ही जाएगा जिसे ढूँढने वो निकली थी. पुलिस वाले ने कहा क्या करें हम? अपना धंधा करती है करने दो.
मैं रोड के इस कोने से देर तक उसे देखता रहा. वो उसी मंच की तरफ जा रही थी जहाँ उसके "सम्मान" की बात हो रही थी. दूर कहीं भीड़ में खो गयी अपना हक़ो-हुकूक ढूँढने. मेरे कानों में वहां पर भी लाउडस्पीकर की आवाज़ सुनायी दे रही थी. दोस्तों ने ऑटो वाले से बात कर ली थी. ऑटो घर की तरफ दौड़ पडा.
its true sir nd vry nice blog......
ReplyDeleteNice writing....... :)
ReplyDeleteFirst, I didn't feel like writing anything here. But I think I must ask one question... Why this kolaveri?
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