अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Saturday, May 26, 2012

अभिव्यक्ति की नहीं गुंडई की स्वतंत्रता जरूरी है


ग्यारहवीं की राजनीति शाष्त्र की किताब में छपे कार्टून को लेकर विवाद है. इस कार्टून में अंबेडकर को घोंघे पर बैठा दिखाया गया है. उनके पीछे नेहरू उन पर चाबुक चलाने की मुद्रा में खड़े हैं. कार्टून 1949 में छपा था, तब पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर दोनों जीवित थे. कार्टून को मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर ने बनाया था. इसे किताबों में लाये हुए भी 6 साल हो गए हैं.


अब कार्टून के हवाले लोकतंत्र को कार्टून बनाने का हवाला देखिये. एन सी ई आर टी की जो किताबें स्कूली बच्चों के हाथों में होनी चाहिये थी फिलहाल बौद्धिक जाम में फंसी हैं.


6 साल बाद अचानक कुछ लोगों (विद्वानों, चिंतकों, नेताओं) की बुद्धि खुल गयी. उन्हें लगा कि उनकी भावना आहत हुई है. आहत भावना ने विद्वानों को गुंडई पर उतार दिया.


गुंडई एक खास किस्म का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम है. गुंडई का वर्णन धर्मग्रंथों से लेकर इतिहास की किताबों और अखबारों में बखूबी मिलता है. चूँकि गुंडई एक रंगारंग कार्यक्रम है, इसीलिए इसका रंगों से गहरा नाता है. गुंडई हरे रंग की होती है, जिसको विद्वान प्राचीनतम ठहराने की हरसंभव कोशिश करते हैं. गुंडई लाल रंग की भी होती है, जिसे विद्वान सामाजिक सरोकारों की गुंडई बतलाते हैं. भगवा रंग की गुंडई के धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व देश की प्रगति के लिए कितने ज़रूरी हैं, यह बात विद्वानों के भाषणों से सबको समझ आ ही जाती है.


अब मौकाए-दस्तूर नीली गुंडई का है. इसे बहुत पुरानी होते हुए भी नया माना जाता है. जिसको इस देश के जातिवादी लोगों ने दबाकर रखा था. नीली गुंडई भी विद्वानों के दिमागी कोख से ही पैदा होती है.


इन सबसे "बेबाक, बिंदास फिर भी नापाक" किस्म की गुंडई सफ़ेद रंग की गुंडई है. जो हर किस्म की गुंडई का पालन, पोषण करने की ज़िम्मेदारी संभालती हैं. संसद और विधानसभाओं में इसके जलवे समय-समय पर देखे जाते हैं.


विद्वान लोग समय समय पर गुंडई की स्वतन्त्रता के लिए गोलबंदी भी करते रहते हैं.


गोलबंदी के वक़्त अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता वाले अपने पिछले भाषण को भी विद्वान लोग भूल जाते हैं. भूलना मानवीय है. इसी बहाने ये भी भुला दिया जाता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का विरोध करने से अपनी ही आज़ादी खतरे में आती है. ज़ाहिर है ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान दबे-कुचले समुदायों की अभिव्यक्ति को ही होगा.


किताब में सिर्फ अंबेडकर पर कार्टून नहीं हैं, इसमें गांधी जी, नेहरू, इंदिरा गांधी, पर कई भी कार्टून हैं. लिहाज़ा अम्बेडकर, गांधी, नेहरू, की बराबरी में खड़ा होने के लिए सांसदों ने खुद भी कार्टून बनने का रास्ता चुना.

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