अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Monday, May 28, 2012

लोकतंत्र के कार्टूनीकरण का दौर



भारत एक संसदीय लोकतंत्र वाला देश है. भारत का लोकतंत्र बहुत पुराना नहीं है. भारतीय लोकतंत्र महज 62 साल का बालक है. अनेक देशों में लम्बे समय से चल रहे लोकतंत्र के अनुभव भी बताते हैं कि लोकतंत्र को परिपक्व होने में समय लगता है. 

 लोकतंत्र के मामले में भारत की हर मोर्चे पर प्रशंसा होती है. इन सब खूबियों के बीच ध्यान देने वाली बात भारतीय लोकतंत्र के साथ घटित हुई घटनायें हैं. ये ऐसी घटनायें हैं जो लोकतंत्र की सकारात्मक तस्वीर पेश नहीं करती.



 23 मई को भारत के बड़े अखबार "दैनिक जागरण" में जाने माने पत्रकार "कुलदीप नैय्यर" ने लिखा भारत में संसदीय पद्धति की जगह राष्ट्रपति पद्धति का शासन अपनाने पर विचार करना चाहिए. 26 मई को दैनिक "हिदुस्तान" में इसी तरफ इशारा करता हुआ "खुशवंत सिंह" का लेख छपा.




दोनों लोग अपने-अपने समय के विचारक पत्रकार रहे हैं. दोनों ही आज भी बौद्धिक मंडली में अच्छा दखल रखते हैं.



यहाँ दीगर बात यह है कि संसदीय प्रणाली में किसी भी तरह के परिवर्तन का मतलब होगा देश की आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था में बदलाव. यह आसान काम नहीं है. लेकिन बदलाव की इस बहस के चल पड़ने के पीछे कई ठोस वजहें हैं. 

दुखद बात यह है कि ६० साल से भी अधिक का लोकतंत्र अपने नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया. देश उतना विकास नहीं कर पाया जितनी इसमें कुव्वत थी, संभावनाएं थी.
हाल के वर्षों में संसदीय व्यवस्था ने लोगों का भरोसा खोया है. लोगों के बीच में जन प्रतिनिधियों प्रति अविश्वास बढ़ा है.



बढ़ते अविश्वास के भी गहरे कारण हैं. देश की सर्वोच्च संस्था यानी संसद में दागी छवि के लोगों की संख्या बेतहासा बढ़ी है. पैसों ने योग्यता की जगह ली है. राजनीति में बहसें वोटरों की ज़िन्दगी को बेहतर करने के प्रबंधों पर नहीं बल्कि "वोटर प्रबंधन " पर होने लगी हैं.


इस देश में आज बहसें भी बहकी बहकी होती हैं. यहां यह बहस नहीं होती कि देश ने गरीबी को कितना पाटा. बहस इस बात पर होती है कि देश में अब भी कितने गरीब बचे हैं. देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से भेजा गया 1 रुपया असल में जिसके लिए होता है उस तक 15 पैसा ही पहुँच पाता है. आज भी देश में उसी पार्टी की सरकार है लेकिन आज बहस होती है कि कौन सा घोटाला अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला रहा. एक घोटाला दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहा है, अपने आकार और प्रकार की विशिष्टता के लिए.


भारत के संविधान की आत्मा इसकी धर्मनिरपेक्ष छवि है. लेकिन आज भी बहस इस बात पर होती है कि समुदाय विशेष के अधिकारों की रक्षा कैसे हो. सरकार को ऐसा कानून बनाना पड़ता है जिसके मूल में ये माना जाता है कि एक समूह हिंसक है अतः उसे शक की निगाह से देखा जाना चाहिए.

वर्तमान में विकास का स्वरूप भी अटपटा है. विकास ऐसा है जो विनाश भी अपनी बराबरी में रखता है. यह समावेशी विकास नहीं है चिंदी चिंदी विकास है.


विकास की ज़रूरत का अहसास होने के बावजूद भी लोग ऐसे विकास से खुश नहीं हैं. यह विकास लोगों को प्रतिरोध के मंचों पर खड़ा कर रहा है. लोग बागी हो रहे हैं. असमानता गहराती जा रही है.

हर भारतीय की कल्पना इससे बेहतर भारत की है. यह महज़ कल्पना नहीं है यह भारतीयों की अपेक्षा हैउम्मीद है.
यही अपेक्षा भारत के नागरिकों को सरकार के विरुद्ध खड़ा करती है. जब सरकार नहीं दे पाती तो लोग दूसरे रास्ते तलाश करते हैं. अन्ना हजारे के आन्दोलन के साथ लाखों लोगों के कूद जाने के पीछे भी यह एक बड़ा कारण है.

ऐसे में हमारे जनप्रतिनिधियों के पास मौका होता है कि वो लोगों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप काम करें. लेकिन हमारे जनप्रतिनिधियों के बीच ऐसा कोई उत्साह नहीं दिखता. 
आखिर नेता-मंडली लोगों के बीच अलोकप्रिय हो रही राजनीति पर मंथन क्यों नहीं करती.


लोकतंत्र की मजबूती का आकलन वहां के नागरिकों को मिले अधिकारों से भी लगाया जाता है. सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार, भोजन का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार आदि वो बुनियादी  तत्व हैं जो लोगों की आस्था लोकतंत्र के प्रति बनाये रखते हैं.




बजाय इसके कि लोगों को अधिकार संपन्न बनाया जाय नेता बिरादरी सहनशीलता तक खोती जा रही है. बुनियादी हकों को लेकर लोग एक तरफ आन्दोलन चला रहे हैं तो दूसरी तरफ इनके खिलाफ हमारे जन प्रतिनिधि ही खड़े हो जा रहे हैं.

हाल ही में ग्यारहवीं की किताब में अंबेडकर पर छपे कार्टून को लेकर भी हमारी संसद ने नागरिकों को निराश ही किया. कार्टून के बहाने लोकतंत्र को कार्टून बनाया गया. सरकार वोट बैंक के जाल में फंसी दिखी.

ऐसे में हमारी व्यवस्था घुटने टेकने वाली नहीं हो सकती.
कुलदीप नैय्यर और खुशवंत सिंह इसी और इशारा करते हुए कहते हैं कि गठबंधन आज की हकीकत बन चुकी है. इसीलिये हर बुरी हालत के लिए गठबंधन बहाना नहीं बनाया जा सकता.

गठबंधन की राजनीति से जल्द छुटकारा नहीं मिलता देख ही राष्ट्रपति पद्धति को बेहतर माना जाने लगा है. निर्णय लेने की तीव्रता के सम्बन्ध में फ़्रांस और इंग्लैंड से प्रेरित कही गयी यह बातें आज प्रासंगिक होने लगी हैं.



Sunday, May 27, 2012


कुर्सी तो चली ही गयी, कहीं जेल…..



नेतागिरी का यही नुकसान है कि आपकी मनमानी तभी तक चलती है जब तक कुर्सी हाथ में है. कुर्सी जाने के साथ ही मुसीबतों का पहाड़ सामने आ खड़ा होता है. उस पहाड़ के सामने आपकी फौलादी नेतागिरी भी कमज़ोर पड़ने लगती है. आजकल नेतागिरी का यही साइड इफेक्ट उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को परेशान किये हुआ है.


 भ्रष्टाचार से घिरी और इसी कारण से गिरी सरकार की मुखिया रह चुकी हैं मायावती.
आजकल मायावती सरकार के दौरान हुई कई गड़बड़ियाँ सामने आ रही हैं. इसे एक तरफ विरोधियों की बदले की भावना माना जा रहा है तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव की सिस्टम को साफ करने की कवायद.

इसी सिलसिले में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत  मिली जानकारी में मायावती द्वारा 86 करोड़ रुपये की सरकारी रकम के दुरुपयोग का मामला भी सामने आया है.


वहीं सीबीआई भी राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन घोटाले की जांच कर रही है. इस घोटाले के तार भी मायावती सरकार के तमाम अफसरों से होते हुए कई मंत्रियों तक जुड़ रहे हैं.

भ्रष्टाचार में मायावती सरकार के कई मंत्रियों पर लोकायुक्त की जांच में दोषसिद्ध हो चुका है. और उसकी जांच की आंच उनके पास तक भी पहुंच रही है। 


बदले हुए हालात में आजकल मायावती खुद मोर्चा संभाल रही हैं. मीडिया से दूरी बनाये रखने वाली मायावती आजकल मीडिया से समय समय पर मुखातिब हो रही हैं. हों भी क्यों ना सब सत्ता की चाबी छिन गयी हो तो तेवर तो नरम करने ही पड़ते हैं. खासकर तब जब विरोधी आपको घेरने का हर संभव प्रयास कर रहे हों. साथ ही आय से अधिक सम्पति के मामले में केंद्र की कांग्रेस सरकार कब सख्त हो जाये इसका भी तो गुणा-भाग पहले से रखना ही पड़ता है.



यूँ तो कांग्रेस के साथ राष्ट्रपति चुनाव के लिए सियासी लेन-देन की गोटियाँ बैठाने की पूरी जुगत हो रही है लेकिन कांग्रेस का साथ देने वालों की लिस्ट लम्बी है. मायावती के धुर विरोधी मुलायम कांग्रेस के लिए लम्बे समय से मुलायम बने हुए हैं. ऐसे में एक म्यान में दो तलवारें कैसे आ पायेंगी. कांग्रेस ममता बनर्जी के "कान मरोड़न " से पहले से पीड़ित है. आगे अब कोई भी कदम सियासी पेंचों को ठीक से कसकर ही उठायेगी.



यूपी में सियासी रथ मायावती की सवारी के लिए था. मायावती महारानी से कम नहीं थी. माया ने कृष्ण के रोल के लिए कैबिनेट सचिव शशांक शेखर को कास्ट किया था. 
वक्त पलटी खा गया, जनमत गच्चा दे गया. अब महारानी और सारथी दोनों ही सियासी झंझावातों से जूझ रहे हैं.

Saturday, May 26, 2012

अभिव्यक्ति की नहीं गुंडई की स्वतंत्रता जरूरी है


ग्यारहवीं की राजनीति शाष्त्र की किताब में छपे कार्टून को लेकर विवाद है. इस कार्टून में अंबेडकर को घोंघे पर बैठा दिखाया गया है. उनके पीछे नेहरू उन पर चाबुक चलाने की मुद्रा में खड़े हैं. कार्टून 1949 में छपा था, तब पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर दोनों जीवित थे. कार्टून को मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर ने बनाया था. इसे किताबों में लाये हुए भी 6 साल हो गए हैं.


अब कार्टून के हवाले लोकतंत्र को कार्टून बनाने का हवाला देखिये. एन सी ई आर टी की जो किताबें स्कूली बच्चों के हाथों में होनी चाहिये थी फिलहाल बौद्धिक जाम में फंसी हैं.


6 साल बाद अचानक कुछ लोगों (विद्वानों, चिंतकों, नेताओं) की बुद्धि खुल गयी. उन्हें लगा कि उनकी भावना आहत हुई है. आहत भावना ने विद्वानों को गुंडई पर उतार दिया.


गुंडई एक खास किस्म का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम है. गुंडई का वर्णन धर्मग्रंथों से लेकर इतिहास की किताबों और अखबारों में बखूबी मिलता है. चूँकि गुंडई एक रंगारंग कार्यक्रम है, इसीलिए इसका रंगों से गहरा नाता है. गुंडई हरे रंग की होती है, जिसको विद्वान प्राचीनतम ठहराने की हरसंभव कोशिश करते हैं. गुंडई लाल रंग की भी होती है, जिसे विद्वान सामाजिक सरोकारों की गुंडई बतलाते हैं. भगवा रंग की गुंडई के धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व देश की प्रगति के लिए कितने ज़रूरी हैं, यह बात विद्वानों के भाषणों से सबको समझ आ ही जाती है.


अब मौकाए-दस्तूर नीली गुंडई का है. इसे बहुत पुरानी होते हुए भी नया माना जाता है. जिसको इस देश के जातिवादी लोगों ने दबाकर रखा था. नीली गुंडई भी विद्वानों के दिमागी कोख से ही पैदा होती है.


इन सबसे "बेबाक, बिंदास फिर भी नापाक" किस्म की गुंडई सफ़ेद रंग की गुंडई है. जो हर किस्म की गुंडई का पालन, पोषण करने की ज़िम्मेदारी संभालती हैं. संसद और विधानसभाओं में इसके जलवे समय-समय पर देखे जाते हैं.


विद्वान लोग समय समय पर गुंडई की स्वतन्त्रता के लिए गोलबंदी भी करते रहते हैं.


गोलबंदी के वक़्त अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता वाले अपने पिछले भाषण को भी विद्वान लोग भूल जाते हैं. भूलना मानवीय है. इसी बहाने ये भी भुला दिया जाता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का विरोध करने से अपनी ही आज़ादी खतरे में आती है. ज़ाहिर है ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान दबे-कुचले समुदायों की अभिव्यक्ति को ही होगा.


किताब में सिर्फ अंबेडकर पर कार्टून नहीं हैं, इसमें गांधी जी, नेहरू, इंदिरा गांधी, पर कई भी कार्टून हैं. लिहाज़ा अम्बेडकर, गांधी, नेहरू, की बराबरी में खड़ा होने के लिए सांसदों ने खुद भी कार्टून बनने का रास्ता चुना.