अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Sunday, May 27, 2012


कुर्सी तो चली ही गयी, कहीं जेल…..



नेतागिरी का यही नुकसान है कि आपकी मनमानी तभी तक चलती है जब तक कुर्सी हाथ में है. कुर्सी जाने के साथ ही मुसीबतों का पहाड़ सामने आ खड़ा होता है. उस पहाड़ के सामने आपकी फौलादी नेतागिरी भी कमज़ोर पड़ने लगती है. आजकल नेतागिरी का यही साइड इफेक्ट उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को परेशान किये हुआ है.


 भ्रष्टाचार से घिरी और इसी कारण से गिरी सरकार की मुखिया रह चुकी हैं मायावती.
आजकल मायावती सरकार के दौरान हुई कई गड़बड़ियाँ सामने आ रही हैं. इसे एक तरफ विरोधियों की बदले की भावना माना जा रहा है तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव की सिस्टम को साफ करने की कवायद.

इसी सिलसिले में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत  मिली जानकारी में मायावती द्वारा 86 करोड़ रुपये की सरकारी रकम के दुरुपयोग का मामला भी सामने आया है.


वहीं सीबीआई भी राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन घोटाले की जांच कर रही है. इस घोटाले के तार भी मायावती सरकार के तमाम अफसरों से होते हुए कई मंत्रियों तक जुड़ रहे हैं.

भ्रष्टाचार में मायावती सरकार के कई मंत्रियों पर लोकायुक्त की जांच में दोषसिद्ध हो चुका है. और उसकी जांच की आंच उनके पास तक भी पहुंच रही है। 


बदले हुए हालात में आजकल मायावती खुद मोर्चा संभाल रही हैं. मीडिया से दूरी बनाये रखने वाली मायावती आजकल मीडिया से समय समय पर मुखातिब हो रही हैं. हों भी क्यों ना सब सत्ता की चाबी छिन गयी हो तो तेवर तो नरम करने ही पड़ते हैं. खासकर तब जब विरोधी आपको घेरने का हर संभव प्रयास कर रहे हों. साथ ही आय से अधिक सम्पति के मामले में केंद्र की कांग्रेस सरकार कब सख्त हो जाये इसका भी तो गुणा-भाग पहले से रखना ही पड़ता है.



यूँ तो कांग्रेस के साथ राष्ट्रपति चुनाव के लिए सियासी लेन-देन की गोटियाँ बैठाने की पूरी जुगत हो रही है लेकिन कांग्रेस का साथ देने वालों की लिस्ट लम्बी है. मायावती के धुर विरोधी मुलायम कांग्रेस के लिए लम्बे समय से मुलायम बने हुए हैं. ऐसे में एक म्यान में दो तलवारें कैसे आ पायेंगी. कांग्रेस ममता बनर्जी के "कान मरोड़न " से पहले से पीड़ित है. आगे अब कोई भी कदम सियासी पेंचों को ठीक से कसकर ही उठायेगी.



यूपी में सियासी रथ मायावती की सवारी के लिए था. मायावती महारानी से कम नहीं थी. माया ने कृष्ण के रोल के लिए कैबिनेट सचिव शशांक शेखर को कास्ट किया था. 
वक्त पलटी खा गया, जनमत गच्चा दे गया. अब महारानी और सारथी दोनों ही सियासी झंझावातों से जूझ रहे हैं.

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