अंट-शंट

दिल में अरमान बहुत हैं लिख डालने के.पता नहीं उँगलियों को क्यों भरोसा नहीं होता कि मैं कुछ लिखूंगा तो की-बोर्ड की स्याही ख़त्म नहीं होगी.

Tuesday, October 26, 2010

अयोध्या में राम बगल में छुरी

आनंद प्रधान द्वारा ११ अक्टूबर का सम्पादकीय (जनसत्ता) "अयोध्या के सबक " पढ़ा. अयोध्या की बहुपरती जटिलताओं को सहजता से परोसने का प्रयास विफल रहा.उच्च न्यायालय का फैसला , जिसे कुछ लोगों ने "पंचायती" या "सबको खुश करने वाला" बताया अगर इससे परे होता तो क्या समस्या का समाधान हो जाता?अगर फैसला सिर्फ मंदिर या मस्जिद के पक्ष में होता तो क्या सब कुछ शिथिल हो जाता?अगर आप फैसले को इस रूप में नहीं देखना चाहते तो फिर किस रूप में देखना चाहते हैं?इन प्रश्नों का उत्तर पूरे लेख में नहीं मिल पाया.इसे हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति की रुग्णता और ज़र्जरता ही समझा जाना चाहिए की सन 1984 से अब तक इस मुद्दे का राजनीतिक मुनाफाखोरी के लिए तो भरपूर इस्तेमाल किया गया पर किसी सार्थक हल की तरफ नहीं ले जाया गया.इस निर्णय के अलोक में बेशक मस्जिद के विध्वंसकों को माफ़ नहीं किया जा सकता पर पुरातत्व विभाग के सर्वे को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता जिसमें कहा गया है की 'यह स्थल किसी धार्मिक स्थल का भाग था' . 'न्यायालय के बाहर समझौते' के न्यायालय के तमाम सुझावों के बाद भी जब कोई परिणाम नहीं निकल पाया तो ही न्यायालय ने अपना निर्णय दिया ,जो कई मायनों में स्वागतयोग्य है.इस निर्णय से एक पक्ष का निराश होना स्वाभाविक था.मुस्लिम समुदाय ने अपनी असहमति ज़ाहिर भी की पर हमारा राजनीतिक इतिहास गवाह है की बाबरी-अयोध्या विवाद को मुसलमानों ने सिर्फ धार्मिक श्रद्धा के लिहाज़ से देखा पर हिन्दू पक्षकारों ने राजनैतिक ,सांप्रदायिक व् भावनात्मक फायदा उठाया.ऐसे में फैसले के बाद सतह के नीचे चल रही बैचेनी ,गुस्से और वैमनस्य का फलक कहीं और बड़ा होता गर फैसला बिंदुमात्र भी इतर होता.यहाँ पर यह समझाना भी प्रासंगिक होगा की हिन्दू की राम या मुस्लिम की खुदा के प्रति आस्था वाया संघ,विहिप,भाजपा या वक्फ बोर्ड नहीं होती आस्था का इस छोर से उस छोर तक का सरोकार सीधा व् प्रत्क्षय होता है.ऐसे में कुछ सांप्रदायिक कट्टरपंथियों की आलोचना या बुराई को विचारधारा की "धर्मनिरपेक्षता" नहीं समझा जा सकता क्योंकि कोई भी भला मानुष इन संगठनों को अपनी धार्मिक आस्था का ठेकेदार नहीं मान सकता.

नीरज भट्टचम्पावत,उत्तराखंड.

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