
मै आज इस लेख को इसीलिये लिखना चाहता हूँ की जब भी मौका मिले, ज़िंदगी के अलग अलग पड़ावों पर पहुचकर मुड़कर देखूं तो मुझे मेरी जड़ें, मेरी ज़मीन का अहसास करती रहें.यह लेख मेरे भूत का ऐसा आइना बने जिसको देख कर मुझे अहसास होता रहे कि मेरी तब की सतह और अब की सतह में क्या फर्क आया है.बेहतरी हो तो तो अपनी बेहतरी के कारणों की विवेचना कर सकूं.बदतरी की तरफ जाऊं तो अपने को इस लेख से प्रेरणा लेने को कहूँ, खुद का आह्वानकरूँ कि देख तू तब इतना कर सकता था तो आज इससे कई गुना बेहतर कर सकता है. इस लेख को पढ़कर में अपनी सोच के सीमिति दायरे पर हंस सकूं और खुद पर गर्व कर सकूं की देख
आज मैने अपना फलक कितना बड़ा कर लिया है.इस लेख को पढ़ कर मुझे अपनी आँखों के आज के सपनों काअहसास होता रहे.मुझे इस बात का भी अहसास होता रहे की जो सपने मेने देखे वो कितने सपने थे कितनी हकीक़त में. अपने सपनों को साकार करने में कितनी ईमानदारी दिखा पाया?
मेरी खुद से क्या-क्या उम्मीदें हैं?मेरी खुद की क्या-क्या चाहतें हैं?
एक बात तो साफ़ करता चलूँ कि इस वक़्त मेरे आँखों के सामने चल रही भविष्य की 'तस्वीर' बेहतर ,सुनहरी औरचमकीली है.क्योंकि मेरी उम्मीद भी विनोद दुआ जी से मेल खाली है जिसमें हमारे कल को आज से बेहतर होने की उम्मीद होती है.
आज का दिन मेरे लिए कई मायनों में खुशी भरा हुआ है.मसलन आज मेरा अन्तिम रूप से,
मेरे स्वप्न संस्थान"भारतीय जन संचार संस्थान" में हिन्दी पत्रकारिता हेतु चयन हुआ है.२९ जून को साक्षात्कार देने के बाद से ७ जुलाई के दिन परिणाम आने तक के दिन काफी मुश्किलों में कट रहे थे.इनदिनों में मैं अपने साक्षात्कार में किये गए प्रदर्शन का गुणा-भाग करने में लगा था.क्योंकि इस दिन का मुझे २ साल से इंतज़ार था.
यह मेरा दूसरा प्रयास था.पिछली बार साक्षात्कार के बाद भी चयन नही हो पाया था.खैर फॉर्म तो उससे पहले भी डाला था वो बात और थी कि मैं अपने
विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के चलते प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाया था.
इस बार मेरे लिए चयनित होना इसीलिये भी जरुरी था कि मै पिछले साल से अपने घरवालों (खासकर अपने भैया श्री संजय भट्ट) से यही कह रहा था कि मुझे सिर्फ पत्रकार बनना है और मै आई आई एम सी की ही तैयारी में लगा हूँ और मुझे किसी भी हाल मे वहीं जाना है.इसी जिद के चलते मैने सिवाय टीवी टुडे के कहीं और का कोई फॉर्म भी नहीं डाला.अगर मै इस बार प्रवेश नहीं पा पाता तो मेरे लिए जवाब देना बड़ा मुश्किल हो जाता और आज मै या तो बेमन ही सही अपनी प्रशिक्षक की नौकरी को जारी कर रहा होता या फिर किसी कॉल सेंटर मे नौकरी तलाश रहा होता.और अपने पत्रकार बन सकने की खुद की क्षमताओं को कोसता हुआ सोच में डूबा रहता.बरहहाल,ऐसा नही हुआ और मेरी मुराद पुरी हुई.मै अपने साक्षात्कार के प्रदर्शन से ज्यादा खुश नहीं हूँ क्योंकि मुझे लगता है मैंने जितना बोला वो प्रभावकारी तो नही ही था, तथ्यों, तर्कों व आंकड़ों के लिहाज़ से भी ढीला ढाला था.खैर मुझे कहीं न कहीं लिखित परीक्षा पर भरोसा था जो काफी अच्छी हुए थी.उसी का परिणाम है मै ये लेख लिख रहा हूँ. आई आई एम सी में चयन को लेकर में इसलिये भी दबाव में आ गया था की मैने इससे पहले एक बार पूरी तरह से मन बनाने के बाद भी टीवी टुडे में प्रवेश लेने का ख्याल छोड़ दिया.इससे पहले में अपने परिवार सहित लगभग सभीको बता चुका था की में टीवी टुडे ज्वाइन करने जा रहा हूँ.भैया ने भी बोल दिया था ठीक है मै तुम्हारे खाते में पैसे भेज दूंगा तुम एडमिशन लेलो.चूंकी मेरे मम्मी पापा को टीवी टुडे क्या है पता नहीं है तो मैने उन्हें समझाने के लिए कहा की पापा मेरा चयन 'आज तक' के स्कूल में हुआ है जिसमें समाचार आते हैं.गाँव में तो ये खबर आग की तरह फ़ैल गयी.मुझे कई लोगो के बधाई वाले फ़ोन आने लगे यह मानते हुए की मै अब बड़ा आदमी बन गया हूँ.यह खबर उनके लिए प्रमाण पत्र के रूप में थी क्योंकि उन लोगों की उम्मीदें तो पहले से मुझसे बड़ा आदमी बनने की हैं.मेरे जीजा जी का तो तल्खी भरा फ़ोन आता है 'मै तो पहले से कहता था तुम बड़े हो जाओगे तो हमें नहीं पूछोगे',कम से कम बता तो देता तेरा 'आज तक' में हो गया है.खैर मैने किसी तरह सबको समझाया.

एडमिशन लेने के कई पुख्ता कारण भी बन रहे
थे मसलन कुल २४ लोगो का सलेक्शन हुआ था जिसमे
सिर्फ ५ लड़के थे मै उनमें एक था, तो बात तो गर्व की बनती है न?आखिर टीवी टुडे अपने में बहुत बड़ा ब्रांड जो है.साथ ही कई लोगो सहित मैने ये बात भी सोची की आई आई एम सी के बाद भी तो तुझे ऐसे ही किसी मीडिया हाउस के दरवाजे खटखटाने होंगे.ये तो तुझे पहले एक साल की इंटर्नशिप की गारंटी दे रहे है जिसमें उम्मीद की जा सकती है कि पहले साल दी गयी फीस लगभग अदा हो ही जायेगी.और मुझे अपनी काबिलिय
त पर तो कोई शक था नहीं मुझे भरोसा तो था ही किमुझे २ साल बाद वो छोड़ तो पायेंगे नहीं.पर मुझे महज़ एक कर्मचारी नही बनाना था मुझे तो पत्रकार बनाने का जुनून जो है.खैर अंत भला तो सब भला.
मुझे इस बात का पूरा इल्म है कि किसी बेहतरीन संस्थान में चयन मात्र ही आपके भविष्य की रूपरेखा तैयार नहीं कर सकता है या दूसरे शब्दों में कहूँ तो आपको रोज़गार नहीं दे सकता है.मुझे यह भी पता है आई आई एम सी के कई छात्र भी साल के अंत में रोज़गार को लेकर बहुत परेशान रहते हैं.मैने पत्रकारिता कर रहे
कर जाना मुझे गंवारा नहीं.अपनी सारी कमजोरियों पर काम करते हुए कामयाबी के शिखर को पाने का संकल्प लेना होगा मुझे.जहाँ तक प्रश्न मुझे पत्रकारिता से क्या क्या चाहिए का है?मेरे पास इसका कोई तार्किक उत्तर नहीं है.हाँ सीधा सरल उत्तर दूँ तो सिर्फ कह सकता हूँ की पत्रकारिता, एक पत्रकार को जो जो भी दे सकती है वो सब मुझे चाहिए.मसलन पत्रकार होने की ताकत,स्वाभिमान,हिम्मत,कीमत,नेमत,बरकत, और भी जाने क्या क्या?संक्षेप में कहूं तो वो सब जो आज एक नामी पत्रकार के पास है या होने की संभावना है.शुरुवात में जब पत्रकार बनाने की सोचता था तो लगता था की शायद यहाँ आकर खूब पैसे मिलेंगे.वो ख्याल लगभग ज़ेहन से गायब था जब
पत्रकारिता की वास्तविकताओं का पता चलने लगा.पर पिछले कुछ हफ़्तों से जब से मीडियाखबर.कॉम पर खबर पढी की बीबीसी हिंदी के पूर्व प्रमुख संजीव श्रीवास्तव ने जब बीबीसी छोडी तो तब उनका पैकेज ६० लाख सालाना था और जब उन्होंने सहारा ज्वाइन किया तो पैकेज १ करोड सालाना हो गया तो वैसा ख्याल फिर उपज़ने लगा है. शायद बाज़ार का असर मुझे आने लगा है.खैर ऐसी अनगिनत ख्वाहिशों के बीच मेरा मूल उद्देश्य पत्रकारिता को अपना धर्म बनाना है..बनाऊंगा.
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